हजारीप्रसाद द्विवेदी के पत्र

प्रथम खंड

संख्या - 8


IV/ A-2006       

शान्तिनिकेतन

13.11.35

पूज्य पंडित जी,

  प्रणाम!

  आपका लाहौर से भेजा हुआ कार्ड यथासमय मिल गया था। इस बीच मैं कलकत्ते भी गया था और वहाँ आपके घर ही ठहरा था। मेरी आँखे इधर खराब हो गई हैं। मैं पढ़ने-लिखने का काम कुछ भी नहीं कर रहा हूँ। इस पत्र में जो कुछ लिख रहा हूँ, अन्दाज़ पर लिख रहा हूँ। आँखो की सहायता इसमें बिल्कुल नहीं ली गई।

  क्या आप वर्धा गये थे? गुरुदेव की चिट्ठी का क्या कुछ फल हुआ था। सुधाकान्त बाबू तो वहाँ आप से मिले ही होंगे। हिन्दी भवन का क्या हुआ?

  पिछली बार विशाल भारत में वर्मा जी का एक आर्टिकल खुदाई मास्टर पीस नाम निकला था। कल संयोग से श्री क्षिति मोहन1 बाबू ने उस लेख को पढ़ा और लगभग तीन घंटे तक उसकी प्रशंसा करते रहे। उन्होंने मुझसे कहा कि वर्मा जी को मेरी ओर से बधाई दीजिये। उन्होंने बहुत-सी बातें कहीं जो इन आँखो के कारण मैं वर्मा जी तक अभी नहीं पहुँचा रहा हूँ। एक जावा के विद्यार्थी से वर्मा जी का और उनके आर्टिकल   का परिचय कराते हुए उन्होंने बताया कि information मात्र में एक भार होता है। पर जो मनुष्य information को सरस करके लघुभार कर देता है, वह निश्चय ही धन्यवादार्ह है। मैंने वर्मा जी के अन्यान्य लेखों की चर्चा की थी। रुसी भानमेती वगैर: शीर्षक उन्हें खूब पसन्द आये।

  आशा है आप सकुशल होंगे। सभी मित्रों को मेरा प्रणाम।

आपका

हजारी प्रसाद


1 . आचार्य क्षितिमोहन सेन - संत साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान। शान्तिनिकेतन में रहते थे।

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र १९९३, पहला संस्करण: १९९४

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प्रकाशक : इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, नई दिल्ली एव राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली