हजारीप्रसाद द्विवेदी के पत्र

प्रथम खंड

संख्या - 18


IV/ A-2018

शान्तिनिकेतन

7.1.37

मान्यवर चतुर्वेदी जी,

       प्रणाम! कृपा-पत्र मिला। बलराम की चर्चा महाभारत में नाना प्रसंगो पर आई है। एक बार वे पाण्डवों का दु:ख देख कर सोचने लगते हैं कि क्या बात है कि पुण्यात्मा पांडव दु:ख पा रहे हैं और पापी दुर्योधन आनन्द कर रहा है। पर भीम और दुर्योधन दोनों ही उनके शिष्य थे। इसलिए वे किसी भी पक्ष की ओर से युद्ध नहीं करना चाहते। इस विषय में उनसे अधिक दृढ़ता का परिचय महाभारत का कोई भी पात्र नहीं दे सका - भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य इत्यादि कोई नहीं। उद्योग पर्व के दूसरे अध्याय में जब कि पांडवों की मंत्रणा सभा बैठी थी, उन्होंने स्पष्ट रुप से कहा कि युधिष्ठिर ने अपने दोष से राज्य खोया है। इसमें दुर्योधन का कोई अपराध नहीं। वे जुआ खेलने गये ही क्यों? इसीलिए लड़ाई करके दुर्योधन से राज्य माँगना अन्याय है। शान्ति से नम्रतापूर्वक ही उससे व्यवहार करना चाहिए।

अयुद्धमाकांक्षत कौरवाणां साम्नैव दुर्योधनमाह्मवध्वम् (उद्योग २.१३)

इसके बाद जब दुर्योधन और अर्जुन श्रीकृष्ण को अपने-अपने पक्ष में लेने के लिये द्वारका गये और श्रीकृष्ण ने एक तरफ़ स्वयं नि:शस्र रहना और दुसरी तरफ़ दस हज़ार नारायणी सेना देने का वचन दिया तो दुर्योधन ने सेना लेना स्वीकार किया और बलराम से मिलने गये। बलराम ने फिर भी कहा कि मैं दोनों पक्षों में से किसी की ओर नहीं जा सकता। मैं बार-बार कहता हूँ कि मेरा संबंध दोनों ओर बराबर है - मया सम्बन्धकस्तुल्य इति राजन्पुन: पुन:। और न तो मैं पार्थ की सहायता कर्रूँगा और न दुर्योधन की। कृष्ण को देखते हुए यही मेरी निश्चित राय है :

नाह सहाय: पार्थस्य नापि दुर्योधनस्य वै।

इति मे निश्चिता बुद्धिर्वासुदेवमवेश्क्ष्य ह (उद्योग ७.२९)

इसके बाद समर सज्जा हो चुकने के बाद एक बार बलराम फिर पाण्डवों के पास जाते हैं और युधिष्ठिर से कहते हैं कि मैं देख रहा हूँ कि यह दारुण युद्ध होकर ही रहेगा। मैंने कृष्ण से बार-बार कहा है कि पाण्डव और कौरव हमारे लिये समान हैं। इन संबंधियों के साथ समान व्यवहार करो। हमारे लिये जैसे पाण्डव वैसे ही वैसे ही दुर्योधन। तुम उसकी भी सहायता करो। लेकिन कृष्ण ने अर्जुन की ओर देखकर (पक्षपात करके) मेरी कही न की। मैं कृष्ण को छोड़कर (उनके बिना) संसार को देख नहीं सकता, इसलिये अगत्या मुझे भी उनकी इच्छा का अनुवर्तन करना पड़ता है। भीम और दुर्योधन दोनों ही मेरे समान रुप से प्रिय शिष्य हैं। दोनों ही गदायुद्ध में विशारद हैं। इसलिये मैं सरस्वती तीर्थ को जा रहा हूँ, क्योंकि नष्ट होते हुए कौरवौं की मैं उपेक्षा नहीं कर सकता -

भवितायं महारौद्रो दारुण: पुरुषक्षय:।

दिष्टमेतद् ध्रुवं मन्ये न शक्यमतिवर्तितुम। २५  

उक्तो मया वासुदेव: पुन: पुनरुपह्मवरे।

सम्बन्धिषु समां वृकिंत्त वर्त मधुसूदन।   २८

पाण्डवा हि यथाsस्मांक तथा दुर्योधनो नृप:।

तस्यापि क्रियतां साह्मये स पर्येति पुन: पुन:। २९

तच्च मे नाकरोद्वाक्यं त्वदर्थे मधुसूदन:।

निर्विष्ट: सर्वभावेन धञ्जयमवेक्ष्य ह। ३०

न चाहमुत्सहे कृष्णमृते लोकमुदीक्षितुम्।

ततोsहमनुवर्तामि केशवस्य चिकीर्षितम्। ३२

उभौ शिष्यौ हि मे वीरौ गदायुद्धविशारदौ।

तुल्यस्नेहोsस्म्यतो भीमे तथा दुर्योधनो नृपे। ३३

तस्माद्यास्यामि तीर्थानि सरस्वत्या निषेवितुम्।

न हि शक्ष्यामि कौरव्यान्नश्यमानानुपेक्षितम्। ३४

  (उद्योग १५६ अध्याय)

अन्तिम वाक्य ही शायद इस कथन का मूल है कि जो कमज़ोर होगा, बलराम उसी की ओर से लड़ेंगे। मेरी जानकरी जहाँ तक है, संस्कृत महाभारत में ऐसा वाक्य नहीं है। एक और प्रसंग पर बलराम की चर्चा है। उसे भी लिख देता हूँ। शायद उससे आपका अभीष्ट सिद्ध हो। जिस तीर्थयात्रा की बात बलराम ने कही है, वह जब समाप्त हो गई तो लौट कर उन्होंने देखा की लड़ाई प्राय: समाप्त हो गई है। भीम और दुर्योधन का गदायुद्ध होने जा रहा है। दोनों पक्षों के अनुरोध पर बलराम दोनों शिष्यों की लड़ाई देखने लगे। भीषण युद्ध हुआ। अचानक भीम ने उछल कर वार करने की चेष्टा करते हुए दुर्योधन की जांघ पर गदा का आघात कर दिया। उरु भंग हो गया और दुर्योधन कातर आवाज़ के साथ धरती पर लौट गये। यह बात गदायुद्ध के सिद्धान्त के विरुद्ध थी। क्योंकि इस युद्ध में नाभि के ऊपर ही आघात करने का नियम है। बलराम ने जो अन्याय देखा तो क्रोध से जल उठे, और लांगल उठा कर भीम पर पिल पड़े। कृष्ण ने बड़े परिश्रम से उन्हें शान्त किया। वहाँ पर बलराम के कथन के कुछ एक श्लोक यहाँ दे रहा हूँ।

       हे कृष्ण, केवल दुर्योधन ही नहीं गिरा है, दुर्योधन, जो विषम होते हुए भी मेरे समान योद्धा था, बल्कि आश्रित की दुर्बलता से आश्रय की भी निन्दा होती है (अर्थात् दुर्योधन यहाँ अकेला और मेरा आश्रित था, मैं उसका आश्रय था, उसका पतन मेरा भी पतन है।)

न चैष पतित: कृष्ण केवलं मत्समोsसम:

आश्रितस्य तु दौर्बल्यात् आश्रय: परिभत्स्र्यते 

(शल्य पर्व ६० अध्याय)

(यह श्लोक केवल बंबई के छपे महाभारत में है। कलकत्ता वाले में नहीं। पर अन्य कई हस्तलिखित प्रतियों में है।)

कुछ विस्तारपूर्वक मैंने इस प्रसंग की चर्चा इसलिये की कि आप अपनी ज़रुरत के अनुसार उपयोग करें। बहुत खोजने पर भी मैं आपके पत्रोक्त वाक्य (दुर्बल का पक्ष ग्रहण करेगा) न पा सका।

       मेरा एक लेख बहुत दिनों से पड़ा है। ज़रा controversial हो सकता है। भेजता हूँ, पसन्द आवे तो छाप दीजियेगा। किसी पर कोई व्यक्तिगत आक्षेप नहीं और न किसी के किसी लेख का जवाब है। अर्थात् विशाल भारत की नीति के विरुद्ध नहीं है।

       शेष कुशल है।

आपका

हजारी प्रसाद  

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र १९९३, पहला संस्करण: १९९४

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प्रकाशक : इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, नई दिल्ली एव राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली