Loka Parampara

सांस्कृतिक समुदाय की जीवन शैली का अध्ययन करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को अपनाया जाना चाहिए। इस कारण इस प्रकार के अध्ययन में निम्न सम्मिलित होंगे:

  1. समुदाय के निवास स्थान का अध्ययन, अर्थात जल, पृथ्वी, चट्टानों, मिट्टी, खनिज, वनस्पति तथा उर्जा के स्त्रोत्रों का मानचित्रण तथा पारिस्थितिक तंत्र के वार्षिक चक्र में इन सभी तत्वों के मध्य अंतःक्रिया।
  2. मनुष्य, जैव-भौतिकी द्वारा निर्मित, प्रकृति तथा वातावरण से संपर्क रखने वाला, तथा आवश्यकतानुसार पौराणिक कहानियों की रचना तथा उनका अनुसरण करने वाला, को समझने के लिए इस वातावरण तथा पारिस्थितिक चक्र का मानव द्वारा अनुकूलन को समझना आवश्यक है। इस कारण इस अध्ययन में अंतरिक्ष तथा तत्वों के निर्माण से सम्बंधित पौराणिक कथाओं को सम्मिलित करना आवश्यक है।
  3. ये कथायें जुडी हुई है। समाज में प्रचलित जल, वनस्पति अथवा कृषि से सम्बंधित, पारिस्थिक तंत्र से जुड़ें रिवाज तथा समारोह, इन मान्यताओं/ कथाओं के प्रदर्शन का एक रूप होते हैं।
  4. इसके उपरांत मनुष्य के स्वयं के प्रति दृष्टिकोण का अध्ययन तथा अपनी शारीरिक कार्यप्रणाली से सम्बंधित ज्ञान का अनुसन्धान करना अगला कदम है। उस क्षेत्र के जल, वनस्पति तथा पशु सम्पदा के साथ विकसित सुरक्षात्मक तथा आरोग्यकारी औषधि का अध्ययन भी आवश्यक है। किसी भी समाज के लिए पौराणिक कथायें तथा संस्कार उतने ही आतंरिक हैं जितना कि ‘ज्ञान’ तथा चिकित्सा, व्यायाम तथा मनोविज्ञान।
  5. मानव-परिवार तथा मानव-समाज के संबंधों का अध्ययन, समाज तथा व्यक्ति कि अवस्था, समाज कि संरचना तथा समाज में व्यक्तियों का अनुमोदन, इसके आलावा विभिन्न मेलें तथा उत्सव जिनका उद्देश्य सिमित समय तथा जगह में असीम जगह तथा समय कि अनुभूति देना होता है, को समझने में सहायता करता है। इसकी मौखिक, गतिज तथा श्रव्य इत्यादि प्रकार की बाहरी अभिव्यक्ति को कला तथा संस्कृति कहा जाता है।
  6. समाज में कारीगरी उपरोक्त कलाओं से अभिन्न होती है। प्रत्येक का मुख्य रूप से उपयोगवादी तथा प्रतीकात्मक कार्य होता है। कला तथा संस्कृति का रूप तथा बनावट नियमबद्ध होता है। यह मुख्य रूप से नजरिये, कथा तथा संस्कारों के आधार पर निर्भर करता है जिसको अभिव्यक्त करने के लिए उस क्षण कला अथवा संस्कृति का उपयोग किया जाता है।
  7. पीढ़ी दर पीढ़ी इस कारीगरी का प्रसार समान रूप से महत्वपूर्ण तथा अधिक मौलिक है। इसमें कौशल का प्रशिक्षण, कच्चे माल की परख से वस्तु के सटीक निर्माण तक सभी कार्य सम्मिलित हैं।
  8. अंततः समूहों, व्यक्तियों तथा सामाजिक संरचना को पद कि एक रूपरेखा प्रदान की जाती है। यह रूपरेखा- दैनिक, मासिक तथा वार्षिक हो सकती है जिसकी गणना सूर्य, चंद्र तथा तारों कि गतिविधियों के आधार पर होती है। पौराणिक कथायें तथा संस्कार शारीरिक लय, प्राकृतिक लय, सभ्यता का लय तथा ज्योतिष चक्र के इस सम्बन्ध की सबसे उपरी परत है।
  9. सौर तथा चंद्र पंचांग जनजातीय-ग्रामीण-शहरी एकता कि तथा छोटे से छोटे समूह में भी पारस्परिक क्रिया कि सबसे मौलिक इकाई है। ‘समय के घेराव’ में, किसी विशिष्ट समयावधि के लिए, सभी स्थानीय तथा स्तरीय वर्गीकरण टूट सकते हैं तथा भूमिकाओं का समकरण अथवा उलटाव भी संभव होता है।

कलात्मक अभिव्यक्ति जीवनशैली का एक मुलभुत अंग होती है। यह जीवन के लय में रीती-रिवाजों तथा त्योहारों के माध्यम से एक विराम के रूप में प्रकट होती है। स्थान प्रतिष्ठित अथवा विस्तृत होता है। अंततः, जन्म से मृत्यु तथा पुनर्जनम का जीवन चक्र, समय की एक अलग रुपरेखा प्रदान करता है जिसमे, प्राकृतिक तथा आध्यात्मिक, पवित्र तथा सांसारिक एक दूसरे में सम्मिलित तथा व्याप्त होते है।
इस दृष्टिकोण के साथ लोक परम्परा सांस्कृतिक समुदायों के विभिन्न पहलुओं पर शोध करता है। प. बंगाल तथा उड़ीसा के संथाल, उड़ीसा के भुंजिया तथा पैक, मणिपुर के मैती, नागालैंड के अंगामी, मध्य हिमालय के गुर्जर, लद्दाख के चन्गपा, हिमाचल प्रदेश के गद्दी , राजस्थान के बाजरा -उगाने वाले समुदाय, कर्नाटक के विश्वकर्मा तथा वनवासी ,तथा तमिलनाडु के मुक्कुवर, जनजातियों पर प्राथमिक अध्ययन प्रारंभ किया गया है।
इस योजना का उद्देश्य सांस्कृतिक समुदाय के विभिन्न पहलुओं जैसे निवास स्थान, पारिस्थितिकी, विश्व-दर्शन, मुष्य के सिद्धांत, व्यक्ति तथा समाज का सम्बन्ध, कलात्मक रचनात्मकता, कौशल तथा ज्ञान का प्रसार, खगोलीय चक्र तथा मानव जीवन की लय, रीती-रिवाजों तथा त्योहारों के माध्यम से जीवन शैली तथा लय में विराम इत्यादि का अध्ययन करना है।

भारत के विभिन्न भागों में प्रारंभिक अध्ययन किये गये हैं। इनमें से कुछ का सञ्चालन आतंरिक विद्वानों द्वारा तथा अन्य का सञ्चालन भारतीय तथा विदेशी विश्वविद्यालयों व संसथानों से सम्बंधित शोधकर्ताओं द्वारा किया जाता है । बाहरी विद्वानों को सम्मिलित करने के दोहरे फायदें है : सिमित समय में समुदायों तथा विषय-वस्तु का विस्तृत प्रचार तथा कम समय में बड़ी संख्या में विद्वानों में इ.गाँ.रा.क.के. के सिद्धांतों तथा प्रणालियों का प्रसारण।
अब तक पूरे किये गये ६७ अध्ययनों में से कुछ ही प्रकाश की किरण दिखा पाए है। क्योंकि मुख्यतः शिक्षण तथा अनुसन्धान का स्तर गिर गया है तथा अधिकतर शोधकर्ता विषय-वस्तु को पढना, ध्यान रखना तथा समझना भूल गए है। फिर भी, मनुष्य तथा संस्कृति के इस अध्ययन में कुछ बहुत ही गहन तीक्ष्णता का आभास होता है। यह अपने आप ही पता चलता है की :

  1. पारम्परिक समायोजन में, अशिक्षित तथा शिक्षित दोनों ही एक दुसरे के अधीनस्थ नहीं होते, क्योंकि स्वभाववश दोनों ही किसी प्रकार की विचारधारा को प्रकट करतें है।
  2. तथाकथित ‘लोक/जनजातीय’ संस्कृति के वैचारिक जगत के लोगों में अमूर्त विचारों के निर्माण करने की क्षमता है जो तथाकथित ‘शास्त्रीय संस्कृति’ के लोगों के साथ तुलनात्मक है। अशिक्षित संथाल, मैती, गद्दी, धनगर तथा अन्य कईं जनजातियों की अभिव्यक्ति वैदिक तथा उपनिषद विचारधाराओं के साथ मेल खाती है।

‘जनजाति’ पर मानव विज्ञान द्वारा किये गए व्यापक अध्ययन, सांसारिक संस्कृति, समारोह, तथा सामाजिक संस्था तक ही सिमित रहते हैं। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् ‘जनजाति’ के विकास पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा रहा है: उन्हें सांस्कृतिक सीमाओं को लांघे बिना प्राचीनता से आधुनिकता की ओर, वनों से शहर की ओर, तीर-कमान से मशीन-गन की ओर प्रशस्त किया जा रहा है। लोक परम्परा के अध्ययन का आधार अनुभविक है; इसके अनुसार ‘जनजाति’ नामक साधारण छोटे समुदाय के लोग न्यूनतम तकनीकों के होते हुए भी, सबसे प्राचीन तथा जटिल विचारों वाले सबसे अधिक उन्नत लोग होते हैं। इस मामले में, स्तरों के अनुक्रम, या ‘विकास’ के एतिहासिक प्रबंधन, महत्वहीन है।
गत दस वर्षों में विभाग द्वारा प्रयोग की गयी शोध की अनुभविक रुपरेखा तथा दृष्टिकोण का मार्गदर्शन एक तिहरी युक्ति द्वारा होता है:

  1. संथाल भाषा के शब्दकोष के लिए आग, हवा, पानी, आकाश, पृथ्वी, बिज, गर्भ जैसे कुछ ही महत्वपूर्ण शब्दों का प्रयोग किया गया, जो जीवविज्ञान, संस्कृति तथा विश्वदर्शन के लिए प्रासंगिक है।
  2. किसी एक संस्कृति अथवा समूह विशेष के जीवन के विभिन्न पहलुओं का गहन अध्ययन. संथाल– जो की बिहार,प.बंगाल तथा उड़ीसा के विशाल क्षेत्रों में जनसँख्या के घनत्व में व्यापक रूप से फैली हुई है– परिक्षण का विषय है । अब तक शोधित विषय-वस्तु के अंतर्गत जीव मंडल तथा पर्यावरण, बांस की कला, खाद्य सामग्री का ज्ञान, ब्रह्माण्ड विज्ञान, देशी औषधि, पशुओं का ज्ञान, पारंपरिक चित्रकला, प्राथमिक तत्त्व, ध्वनि का ज्ञान: मनुष्य की ध्वनि, पशुओं की ध्वनि, मौलिक ध्वनि तथा प्रतीकात्मकता, लिपि, साहित्य, शब्दकोष सम्मिलित हैं।
  3. छोटे समुदायों के तुलनात्मक अध्ययन से सिमित आधार वाले संस्कृति का सिद्धांत इस धारणा के साथ बनाया जा सकता है की वह एक विस्तृत आधार वाले समाजीक सिद्धांत का अंश है। विश्व दर्शन तथा संस्कृति से जुड़े हुए ब्रह्माण्ड संबंधी विषयवस्तु –जिसकी शुरुआत मुलभुत तत्वों, बीज तथा भूमि, जलीय विश्व विज्ञान, औषधि, संगीत, अंतरिक्ष, समय, पंचंगिक रीती रिवाज इत्यादि– का गंभीरता से अध्ययन किया जाता है।

विषय-वस्तु तथा स्थान दोनों की ही दृष्टि से लोक परंपरा के अध्ययन का पहला चरण अपनी परिपक्वता तक पहुँच गया है। इसके निष्कर्षों में से कुछ निषकर्ष, मानवशास्त्रीय तथा मानवजातीय विज्ञान के 14 वें अंतर्राष्ट्रीय महासम्मेलन में प्रस्तुत किये गए, जिसका आयोजन विलियम्सबर्ग में 1998 में 26 जुलाई – 1 अगस्त तक किया गया था। विभाग द्वारा “मानव-शास्त्र के वैकल्पिक मानदंड” पर एक वैज्ञानिक सत्र का आयोजन किया गया था तथा हर्षपूर्वक इसे बहुत अच्छे ढंग से स्वीकारा गया। आय जी एन सी ए के अग्रणी प्रयोग तथा दृष्टिकोण को विस्तृत करने के लिए विभाग एशियाई विद्वानों के छोटे समूह के गठन की योजना बना रहा है।

Nadu.

Major Ongoing Projects of the Division under this programme are –