Vraja Prakalpa

यह अध्यन सामान्य रूप से पुरातत्व विज्ञान के ‘सांस्कृतिक धरोहर’ तथा मानव शास्त्र के ‘सांस्कृतिक अध्यन’ से सम्बंधित है। परन्तु इसके अध्यन का तरीका इन दोनों से भिन्न है जिसमे सांस्कृतिक केन्द्रों (जिसमें मंदिर, मस्जिद तथा अन्य भव्य निर्माण सम्मिलित है) का अध्यन कालक्रम तथा धार्मिक और आर्थिक इतिहास के सीधे तथ्य के रूप में अथवा कई रचनात्मक कलात्मक गतिविधियों के उदगम स्थल की सम्पूर्णता के रूप में किया जाता है। क्षेत्र सम्पदा केवल मात्र किसी क्षेत्र विशेष अथवा मंदिर तथा इसकी इकाइयों का ही अध्यन नहीं है, अपितु इसके निकटवर्ती जनसँख्या पर सांस्कृतिक प्रभाव का भी अध्यन है। इसका अर्थ है किसी केंद्र के सारे पहलु जिसमे धार्मिक, कलात्मक, भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक तथा अन्य पहलु जिसमे इसके पुनर्निर्माण तथा निरंतरता रूपी कारक भी सम्मिलित है। इस शोध के लिए निम्न दो स्थानों को चयन किया गया है: उत्तर भारत में ब्रज का गोविन्ददेव मंदिर तथा दक्षिण भारत में तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर। इस अध्यन की वर्तमान स्थिति इस प्रकार है।

The study has lead to the publication of the following research monographs-

Publications


Conferences
  1. Govindadeva and its Traditions (1992)
  2. Continuing Creation of Vraja (1994)
Exhibitions
  1. Govindadeva – A Dialogue in Stone (1992)
  2. Photographic Exhibition on Living Culture of Vraja by Robyn Beech (1997) and Braj Mahotsav Event was held in 2009 (View Video clips of Evening Performances and listen / download Audio (MP3) of Lectures)

Publication series of Kshetra Sampada: Regional Heritage Series

Field Based Projects