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श्री रामायण - महान्वेषणम्

एम. वीरप्पा मोयिली
अनुवादक - डा. प्रधान गुरुदत्त

2008, xv+418pp, ISBN: 978-81-267-1679-1 Rs. 350.
2014 (Vol.I)923pp.,ISBN:978-81-267-2626-4
2014(Vol.II),652pp.,ISBN:978-81-267-2626-4 (set)Rs.1600(HB).



धर्म वही शाश्वत होता है जो समय की समस्याओं का निदान करने में सक्षम हो। पुराण कथाओं में समय की सारी समस्याओं का समाधान निहित होता है इसलिए पुराण “धर्म-ग्रन्थ” कहे गए हैं। वे समय की सीमाओं को लाँघकर, सैकड़ों पीढ़ियों तक दोहराए जाते हैं। पुराण-पुरुष नही है जिसका जीवन-वृत्त पाठक या श्रोता के मन में साहस और आत्मविश्वास की ज्योति जला दे। पौराणिक आख्यानों में निहित शाश्वत समाधान प्रस्तुत करके समाज को नव-जागरण और नव-निर्वाण की प्रेरणा देना लेखक का दायित्व है। वही तत्त्व लेखन की श्रेष्ठता और सफलता की कसौटी है।

कन्नड़ के प्रसिद्ध लेखक श्री वीरप्पा मोयिली ने इस ग्रन्थ में वाल्मीकि के आधार से, सुमित्रानंद्न श्री लक्ष्मण के अति ओजस्वी व्यक्तित्व को “महान्वेषण” के शब्दावरण में सजाने का प्रयत्न किया है। मोयिली के सौमित्र दीन-दलित मानवता के उत्थान के लिए जो प्रेरणा देते है वे मंत्र आज भी उतने की प्रासंगिक और कार्यकारी प्रतीत होते हैं जितने वे हजारों साल पहले रहे होंगे। इस प्रकार अतीत के दीपक से वर्तमान को प्रकाशित करने का प्रयत्न है श्री रामायण महान्वेषणम्।

 


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