मल्टीमीडिया परियोजनाएँ

इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र ने भारतीय कला के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती जिन परियोजनाओं को विश्व स्तरीय विद्वानों के मार्गदर्शन में शुरु किया गया, उनमें तंजावुर (तमिलनाडु) का बृहदीश्वर मंदिर, महाकवि जयदेवकृत गीत-गोविन्द, राजस्थान की बगड़ावत देवनारायण लोकगाथा, अग्निचयन – एक वैदिक यज्ञ एवं विश्वरूप – भगवान श्रीविष्णु का बृहद् स्वरूप, प्रमुख हैं।

बृहदीश्वर मंदिर तंजावुर: यूनेस्को घोषित एक विश्व सांस्कृतिक धरोहर :

राजराज चोल के द्वारा सन् 1010 में तंजावुर (तमिलनाडु) में निर्मित बृहदीश्वर मंदिर, चोल वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। यूनेस्को ने सन् 1987 में इसे एक विश्व सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान की। पद्मविभूषण डॉ. कपिला वात्स्यायन एवं पद्मभूषण डॉ. नागास्वामी के तत्त्वावधान में बनी इस परियोजना के डीवीडी का लोकार्पण 6 दिसंबर 2013 को माननीय केन्द्रीय मंत्री श्री जयराम रमेश के द्वारा की गई।

गीत-गोविन्द

12वीं शताब्दी का जयदेव कृत गीत-गोविन्द मध्यकालीन भारत का प्राय: सबसे लोकप्रिय संस्कृत काव्य है। भारतवर्ष में ललित कला, संगीत कला, नृत्य कला का कोई भी ऐसा घराना नहीं है जो अपने प्रदर्शन में इस काव्य से अछूता हो। केन्द्र ने इसके छह अष्टपदीयों को कला के विभिन्न प्रारुपों में उसके प्रदर्शन के माध्यम से दिखाने का प्रयत्न किया है। साथ ही, विद्वानों द्वारा इस काव्य की व्याख्या को भी मल्टीमीडिया में सहेजने का प्रयास किया है । इस परियोजना का लोकार्पण 27 मई 2015 को श्री जवाहर सरकार, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, प्रसार भारती के द्वारा की गई।

बगड़ावत देवनारायण लोकगाथा

देवनारायण राजस्थान एवं मध्यप्रदेश के गूजर जाति के लोक- देवता हैं। बगड़ावत देवनारायण लोकगाथा, जिसका सदियों से राजस्थान के लोक-जीवन में मौखिक प्रचलन रहा है, उस समय के सामाजिक अन्तर्द्वन्दों और उनमें उपस्थित समस्याओं तथा संघर्ष का एक अत्यन्त रोमांचक, भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी विवरण प्रस्तुत करती है। देवनारायण की कथा फड़ पर उकेरी जाती है और भोपा रात्रि जागरण में गायन और कथावाचन के माध्यम से लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं। इस डीवीडी में बगड़ावत देवनारायण की कथानक, पात्र, स्थान, प्रयोग में आने वाली वाद्ययंत्र, फड़ चित्रशैली, रंग बनाने की विधि के साथ-साथ भोपाओं के प्रस्तुति के कुछ अंशों को कम्प्यूटर के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इसका लोकार्पण 19 नवम्बर 2017 को श्रीमती सुजाता प्रसाद, अतिरिक्त सचिव, संस्कृति मंत्रालय एवं डॉ. दया प्रकाश सिन्हा, न्यासी के द्वारा किया गया।

अग्निचयन-एक वैदिक अनुष्ठान:

अग्निचयन संभवत: मानवता की प्रचीनतम जीवन्त अनुष्ठान(यज्ञ) है। यह मौखिक परम्परा और उसकी निरन्तरता के अध्ययन की एक विशिष्ट अवसर प्रदान करती है। वैदिक काल की कई महत्त्वपुर्ण बिन्दुओं, जो आज की सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग है, पर प्रकाश डालती है। सांस्कृतिक रुप से अग्निचयन, अग्नि का उद्भव, प्रसार तथा यज्ञवेदी बनाने से सम्बन्धित प्राचीन भारतीय गणित एवं उसमें प्रयुक्त ईंटों को पकाने की तकनीकी को सुदृढ रुप से प्रस्तुत करने में सहायक है।

विश्वरूप:

विश्वरूप श्रीकृष्ण का वह अलौकिक स्वरूप है जिसका दर्शन उन्होंने महाभारत युद्ध से पहले श्रीमद् भगवद्गीता में अर्जुन को कराया था। विश्वरूप शब्द में दो तत्व हैं विश्व और रूप। विश्व का अर्थ ब्रह्मांड से है और रूप का अर्थ यहां आकार है। सैद्धांतिक तौर पर विश्वरूप का अर्थ सभी स्वरूप या सर्वव्यापी आकार से है। इस परियोजना का लक्ष्य विश्वरूप कृष्ण की कुछ चुनिंदा छवियों को प्रस्तुत करते हुए भारतीय कला के अध्ययन के लिए एक संवादात्मक कथ्य प्रणाली प्रस्तुत करना है।

केन्द्र के द्वारा निम्नलिखित मल्टीमीडिया सीडी/डीवीडी का भी प्रकाशन हो चुका है।

गोम्मटेश्वर

श्रवण-बेलगोला कर्नाटक के महत्वपूर्ण जैन धार्मिक केंद्रों में एक है। दसवीं शताब्दी (981 AD) में गंगा राजवंश के शक्तिशाली योद्धा और मंत्री चामुंडराय ने गोम्मटेश्वर (बाहुबली) की लगभग 17.7 मीटर ऊंचा विशाल प्रतिमा को इंद्रगिरी नामक बड़ी पहाड़ी पर बनबाया। इस विशाल प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक लगभग 12 वर्षों के अंतराल पर होता है जिसमें देश-विदेश के लाखों तीर्थयात्री हिस्सा लेते है। इस पवित्र अनुष्ठान का मुख्य हिस्सा “महामस्तकाभिषेक” है जिसमें तरल पदार्थ, जैसे जल, नारियल-पानी, दूध, दही, घी आदि से विशाल प्रतिमा को स्नान करया जाता है। कई सप्ताह चलने वाली इस आयोजन की भव्यता दर्शकों को मन्त्रमुग्ध कर देती है।

इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र ने अपनी मल्टीमीडिया प्रलेखन श्रृंखला के अन्तर्गत श्रवण-बेलगोला स्थित गोम्मटेश्वर की विशाल प्रतिमा से जुड़े कला और अनुष्ठानों को इस डीवीडी के माध्यम से प्रस्तुत किया जिसका लोकार्पण चारुकीर्ति भट्टारक स्वामीजी के हाथों 25 फरवरी 2018 को किया गया।

मुक्तेश्वर मंदिर(चोद्ददानपुरा, उत्तर कर्णाटक)

चौदैयादानापुर का मुक्तेश्वर (शिवलिंग) मंदिर कल्याण की चालुक्य और देवगिरी के सेवुणा द्वारा शासित राज्य के सुनहरे दिनों के दौरान बनाया गया। चौदैयादानापुर दक्षिण भारत के उत्तर-कर्नाटक जिले का छोटा सा गांव है। महान् मूर्तिकार जक्कनाकार्य द्वारा निर्मित यह मंदिर 11वीं से 12वीं सदी की वास्तुकला का गहना है। यह सीडी मंदिर के बहु-आयामी वास्तुकला, मूर्तिकला और शिलालेखों को यूजर-फ्रैंडली इंटरएक्टिव सिस्टम के माध्यम से उपयोगकर्ता को ब्राउज़ करने की अनुमति देता है जिसे सन् 2000 में प्रकाशित किया गया।

रॉक आर्ट

दुनिया के बारे में हमारी पहली जागरूकता दृष्टि (देखने) और श्रव्य (सुनने) की क्षमता से आती है। इन दो इंद्रियों ने हमें अतीत और समकालीन संस्कृतियों में कलात्मक अभिव्यक्तियों को समझने की दृष्टि प्रदान किया है। भारतीय कला की निरंतरता को देखते हुए केंद्र द्वारा आदि-दृश्य (मुख्य दृष्टि) और आदि-श्रव्य (मूल ध्वनि) के जुड़वां कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। यह सीडी 2000 में प्रकाशित किया गया।

अजन्ता: महाराष्ट्र स्थित विश्व धरोहर स्थल

अजंता की गुफाएँ भारतीय इतिहास और कला की एक प्रमुख विरासत है। अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध यह स्थल यूनेस्को की विश्व विरासत स्मारक सूची में शामिल है। प्रस्तुत सीडी में सभी गुफाओं का परिचय वीडियो रुप में, जातक कथाओं और बुद्ध से संबंधित कहानियों को लगभग 1500 सचित्र छवियां, प्रतिष्ठित प्राधिकरणों, ग्रंथसूची, शब्दावली आदि के साथ शामिल किया गया है। अजंता पर अनेक विद्वानों ने अलग-अलग आयामों पर काम किया है पर यह सीडी अजंता पर समेकित रुप से व्यापक ज्ञान और दृश्य अनुभव प्रदान करने का एक प्रयास है। यह सीडी-रोम 2005 में प्रकाशित किया गया।

टू पिलग्रिम्स: एलिजाबेथ सास और एलिजाबेथ सास ब्रूनर्स का जीवनी और कृति

एलिजाबेथ सास ब्रूनर और एलिजाबेथ ब्रूनर, दो हंगेरियन कलाकार 20 वीं शताब्दी में भारत आए और यहीं बस गए। 1920 के दशक में आध्यात्मिकता की तलाश में दोनों कलाकार भारत आए और यहीं से जापान और श्रीलंका गए थे। सत्तर वर्षों में भारत प्रबास के दौरान दोनों चित्रकारों ने कई महत्त्वपुर्ण कृतियाँ बनाई। प्रस्तुत सीडी में उन्हीं कृतियों का एक मल्टीमीडिया डेटाबेस के साथ-साथ उनकी जीवन यात्रा का प्रमुख अंश है। यह सीडी 2010 में प्रकाशित किया गया।

देवदासी  मुरई: देवदासियों को याद

“देवदासी” शब्द एक महिला देव पूजिका को संदर्भित करता है। ज्वलंत दीपक, पानी, संगीत और नृत्य उसके यंत्र हैं। तमिलनाडु में इसकी परंपरा सहस्राब्दी पुरानी और समृद्ध रही है।

यह सीडी बृहदीश्वर मंदिर के बहुआयामी मल्टीमीडिया प्रदर्शन के केन्द्र प्रयास का एक हिस्सा है। सीडी-रोम दक्षिण भारतीय संगीत और नृत्य के स्थानिक और लौकिक संदर्भ के अनुभव की सुविधा प्रदान करता है। यह सीडी दिसंबर 1997 में प्रकाशित हुआ।

मैन एंड मास्क: रुप-प्रतिरुप

मैन एंड मास्क (रुप-प्रतिरुप) सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का एक बहुत ही महत्वपूर्ण तरीका है। इसके माध्यम से संस्कृतियों ने अपनी आंतरिक और बाहरी वास्तविकताओं को परिभाषित करने के लिए अपनी शक्तिशाली संज्ञान और भावनाओं को आवाज दी है। मास्क एक पहलू के बजाय किसी व्यक्ति के कुल व्यक्तित्व को संदर्भित करता है। यह किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान को छुपाने के काम मे भी आता है। यह परियोजना केन्द्र में दुनिया के 22 देशों से संग्रहित मास्क छवियों का एक इंटरएक्टिव डेटाबेस प्रस्तुत करता है। ऐसा डेटाबेस उपयोगकर्ता को दुनिया भर के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों, देशों या विशिष्ट स्थानों से अथवा मास्क के व्यक्तिगत या समूह (जो पचास से अधिक श्रेणियों में वर्गीकृत है)  द्वारा इस संग्रह को ब्राउज़ करने में मदद करेगा। फरवरी 1998 में “मैन एंड मास्क” पर सार्वजनिक प्रदर्शनी में इस डेटाबेस के आधार पर कियोस्क स्थापित किया गया था। डॉ॰ कपिला वत्सयान ने 26 अक्टूबर 2010 को इस डीवीडी का लोकार्पण किया।