बृहदेश्वर मंदिर

ऐतिहासिक दौर में, भारत में कुछ एेसे सांस्कृतिक क्षेत्र विकसित हुए जो सदियों तक समग्र विश्व के लोगों के आकर्षण का केंद्र बने रहे। इसी क्रममें, सन् 1010 में राजराज प्रथम द्वारा निर्मित बृहदीश्वर मंदिर, चोल कला की बेहतरीन उपलब्धि के रूप में विख्यात है। इसकी कलात्मक उत्कृष्टता, वास्तु-कला, शिल्प-कला, चित्रकला, कांस्य मूर्तियाँ, प्रतिमाएँ और पूजा -पद्धति अनूठा है। इसकी उत्कृष्ट कलात्मकता के कारण यूनेस्को ने सन्1987 में इसे ‘महान जीवंत चोल मंदिरों’ के रुप में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर विशाल आयताकार प्रांगण में स्थित है। मंदिर के पूर्व दिशा में स्थित दो व्यापक गोपुरम् से मंदिर में प्रवेश किया जा सकता है।

 

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मंदिर के विशाल प्रांगण में मंदिर का गर्भ-गृह, नंदी मंडप, सभामंडप तथा कई छोटे मंदिर हैं। मुख्य मंदिर की ओर अभिमुख स्तंभों से अलंकृत सभामंडप 16वीं सदी का है। सामने ही ऊँचा दीप स्तंभ है। नंदी मंडप में 6 मीटर लंबे ग्रेनाइट के एक खंड से उत्कीर्ण नंदी विराजमान हैं। यह देश का तीसरा सबसे बड़ा नंदी है।

 

मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है, जिसका आधार 64 वर्ग मीटर है। यहां स्थापित हैँ मंदिर के प्रमुख देवता राजराजेश्वर। ग्रेनाइट से निर्मित विशालकाय लिंग लगभग 3.75मीटर ऊँचा है। गर्भगृह के पूर्व की ओर स्तंभों से सुसज्जित लंबा सभागृह गलियारा और उसके पीछे अर्ध-मंडप स्थित हैं। गर्भगृह के ऊपर पिरामिड के आकार का बुर्ज है जिसकी ऊँचाई लगभग 66 मी. है। इसका शिखर आधार के आकार का ठीक एक तिहाई है। बुर्ज में प्लास्टर-युक्त दीवारें, प्राकार सहित 13 मंज़िलें हैं। गर्भगृह की दीवारें तीन-मंज़िला हैं। मंदिर की प्लास्टर-युक्त दीवारों को देवताओं और मकरों से सुसज्जित ऊँचे तहख़ाने पर उठाया गया है और साथ ही, मूल-स्थान, निर्माण आदि से संबंधित शिलालेखों से आच्छादित है। उत्तरी और दक्षिणी द्वारों तक पार्श्व में स्थित घुमावदार शिखर और अलंकृत पार्श्व पैनलों से सुसज्जित सीढ़ियों से पहुँचा जा सकता है। अर्धमंडप से मोटे तौर पर जुड़ा लंबा सभागार आंशिक रूप से निर्मित है। पूर्वी द्वार के पार्श्व में द्वारपालकों की मूर्तियाँ स्थापित हैं और अंदर की दीवारें 18वीं सदी के मराठा चित्रों से सुसज्जित हैं।

 

मुख्य मंदिर के चारों द्वारों पर दोनों तरफ़ गढ़ी हैं द्वारपालकों की मूर्तियाँ हैं तथा आलों में शिव की मूर्तियाँ, जिनमें लोकप्रिय हैं भिक्षाटनमूर्ति, नटेश, हरिहर और अर्धनारीश्वर। प्रमुख मंदिर के गर्भगृह में आडवल्लन यानी ‘वह जो अच्छा नर्तक हो’ कहलाने वाले शिव विराजमान हैं।

 

आस-पास गर्भ-गृह मौजूद है, जोकि दो कक्षों में विभाजित दो स्तर वाला मार्ग है। निचले दालान में नृत्य करने वाले विशाल शिव, दीवारों तथा छत पर दो परतीय राजपरिवार, दिव्य देवी-देवता की तस्वीरें तथा भित्ति चित्र शोभायमान हैं। ऊपरी दालान के तहख़ाने में विभिन्न मुद्राओं में 81 से अधिक सूक्ष्माकार नर्तकियाँ उत्कीर्ण की गई हैं। बाहर, प्रांगण की दीवारें स्तंभ-श्रेणियों के गलियारों से रेखित हैं। उत्तरी दीवार का गलियारा भारत में सबसे लंबा माना जाता है।

 

मंदिर परिसर में, प्रमुख मंदिर के अलावा दक्षिण की ओर अभिमुख चण्डेश्वर मंदिर है। हालाँकि, मुख्य मंदिर के अनुपात में वह आकार में छोटा है और उसका बुर्ज अष्टकोणीय है। उत्तर-पश्चिमी दिशा में सुब्रह्मण्यम मंदिर है जिसका आधार नृत्यांगनाओं (जिनमें कुछ के हाथ में घड़े हैं) और संगीतज्ञों की मूर्तियों से सुसज्जित हैं। सभागार की दीवारों पर गणपति और दुर्गा को देखा जा सकता है और प्रस्तर की खिड़कियाँ ज्यामितीय डिज़ाइनों से अलंकृत है। तीन-मंज़िला मीनार का शिखर षड्कोणीय है।

पूर्व की ओर बृह्नायकी मंदिर है। इसकी विस्तृत सभागृह मराठा कालीन विस्तार है। सभागृह में देवताओं को प्रदर्शित करने वाले खंभे हैं। यहाँ दक्षिण स्थित द्वार-मंडप के माध्यम से पहुँचा जा सकता है। छत के भीतरी हिस्से में शिव की किंवदंतियों का चित्रण किया गया है। समीप ही दक्षिण की ओर अभिमुख नटेश का मंदिर है।

 

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मंदिर परिसर में, प्रमुख मंदिर के अलावा दक्षिण की ओर अभिमुख चण्डेश्वर मंदिर है। हालाँकि, मुख्य मंदिर के अनुपात में वह आकार में छोटा है और उसका बुर्ज अष्टकोणीय है। उत्तर-पश्चिमी दिशा में सुब्रह्मण्यम मंदिर है जिसका आधार नृत्यांगनाओं (जिनमें कुछ के हाथ में घड़े हैं) और संगीतज्ञों की मूर्तियों से सुसज्जित हैं। सभागार की दीवारों पर गणपति और दुर्गा को देखा जा सकता है और प्रस्तर की खिड़कियाँ ज्यामितीय डिज़ाइनों से अलंकृत है। तीन-मंज़िला मीनार का शिखर षड्कोणीय है।

 

पूर्व की ओर बृह्नायकी मंदिर है। इसकी विस्तृत सभागृह मराठा कालीन विस्तार है। सभागृह में देवताओं को प्रदर्शित करने वाले खंभे हैं। यहाँ दक्षिण स्थित द्वार-मंडप के माध्यम से पहुँचा जा सकता है। छत के भीतरी हिस्से में शिव की किंवदंतियों का चित्रण किया गया है। समीप ही दक्षिण की ओर अभिमुख नटेश का मंदिर है।

 

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Other Links

  • bt_dvd_01sISBN No. : 978-93-80935-03-4Year : 2013

    Price : Rs. 100/- for General Users

    Rs. 50/- for Students


    A set of seven audio-visual DVDs on Brhadisvara Temple was published by the IGNCA

  • bt_dvd_02sTanjavur Brhadisvara – A UNESCO World Heritage Monument
  • bt_dvd_03sBrhadisvara – Lingabhisekam
  • bt_dvd_04sBrhadisvara – Kumbhabhisekam (Part I)
  • bt_dvd_05sBrhadisvara – Kumbhabhisekam (Part II)
  • bt_dvd_06sBrhadisvara – Annual Festivals (Nandi Abhisekam and Dhvajarohana)
  • bt_dvd_07sAn Interview with Kittappa Pillai by Dr. R. Kaushalya, and
  • bt_dvd_08sAn Interview with Babaji Raja Bhonsle by Dr. R. Nagaswamy

    Price : Rs. 400/- for General Users

    Rs. 200/- for Students


View documentary on Making of Interactive Multimedia DVD on Bṛhadīśvara temple (by Dr. Kapila Vatsyayan). Film boradcaseted on DD National and DD Bharti (on 12th April 2014)

Brochure

Image Collection

Books published

kp_006

Tanjavur Bṛhadīśvara : An Architectural Study

kp_010

Bṛhadīśvara Temple: Form and Meaning

kP_009

The Iconography of The Bṛhadīśvara Temple


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